मुझे अपनी ही मस्ती में जीना है……

मुझे अपनी ही मस्ती में जीना है,

मस्त मौजों संग बह जाना है

लहलहाती हवा संग उड़  हैं,

खिलखिलाती हँसी सा बन जाना  है,

मुझे अपनी ही मस्ती में जीना है……

कोई रोके, कोई टोके अब परवाह नहीं किसी की

कोई माने, ना माने,अब चाहत नहीं किसी की

मैंने पल-पल बदलते देखा है लोगो को,

अब चाहे कोई पुकारे या धिक्कारे परवाह नहीं  की

मुझे अपनी ही मस्ती में जीना है……….

उगते सूरज सा बन जाना है

नयी उम्मीदे फिर जगाना है

अँधेरे से खींचकर उजालो तक पहुँचाना है

रोशन कर दुनिया को नया उत्साह है

मुझे अपनी ही मस्ती में जीना है…..

बारिश की  बूँदो सा बनकर

जीवन की  तपन मिटाना  है

निष्प्राण होते अंकुर को

नवजीवन देकर जाना है

मुझे अपनी ही मस्ती में जीना है…..

-विद्योत्तमा चौबीसा

mujhe apani hi masti me jina hai

mast mojho sang bah jana hai

lahlahati hawa sang ud jana hai

khilkhilati hansi sa ban jana hai

mujhe apani hi masti me jina hai…

koi roke,koi toke ab parwah nahi kisi ki

koi mane, na maneab chahat nahi kisi ki

mene pal pal badalte dekha hai logo ko

ab chahe koi pukare ya dhikkare ab parwah nahi kisi ki

mujhe apani hi masti me jina hai…..

ugate sooraj sa ban jana hai

nayi ummide fir jagana hai

andhere se khich kar ujalo tak pahuchana hai

roshan kar duniya ko naya utsah jagana hai

mujhe apani hi masti me jina hai…

barish ki bundo sa bankar

jivan ki tapan mitana hai

nishpran hote ankoor ko

navjivn dekar jana hai

mujhe apani hi masti me jina hai….

-vidyottma choubisa

 

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हर घर में बेटी होनी चाहिए……

 

संकल्प लीजिये आज से हर घर में बेटी होनी चाहिए,
दुसरो के भरोसे नहीं पहल खुद आप होनी चाहिए…… 

सब कहते है…
सब कहते है समाज ख़राब है,
समाज में क्या रहते नहीं आप है;
तो क्यों दोष दुसरो पर लगाए जाने चाहिए, 
संकल्प लीजिये आज से हर घर में बेटी होनी चाहिए, 
दुसरो के भरोसे नहीं पहल खुद आप होनी चाहिए……. 
पहले पिता, पति और पुत्र बनकर…..
पहले पिता, पति और पुत्र बनकर
प्रहरी बनते हो आप ही, 
फिर दुसरो की बेटी पर नज़रे क्यों पाक नहीं, 
जैसी बेटी अपनी है…
जैसी बेटी अपनी है वो भी तो दुसरो की बेटी है,
फिर क्यों दहेज़ और हवस से लूट जाती ये बेटी है? 
क्यों दर्द उसका बन सका अपना नहीं? 
संकल्प लीजिये आज से हर घर में बेटी होनी चाहिए, 
दुसरो के भरोसे नहीं पहल खुद आप होनी चाहिए…… 
माँ, पत्नीऔर बेटी बनकर….. 
माँ, पत्नीऔर बेटी बनकर तुझे ही तो संभाला है, 
तेरे लिए ही जीवन अपना समर्पित कर डाला है; 
क्या तेरा उसके लिए कोई फ़र्ज़ नहीं?
दूध तेरी माँ का तुझे पर क़र्ज़ नहीं?
है तुझसे ये उम्मीद उस माँ की, 
न जाये कोख में मरी कोई बेटी;
पुरुषत्व का जो तू अहम् पाले बैठा है, 
ना होता वो,अगर ना होती वो जननी
संकल्प लीजिये आज से हर घर में बेटी होनी चाहिए, 
दुसरो के भरोसे नहीं पहल खुद आप होनी चाहिए……..

                                                                                  – विद्योत्तमा चौबीसा 

Sankalp lijiye aaj se har ghar me beti honi chahiye
dusaro ke bharose nahi,pahal khud aap honi chahiye
Sab kahte hai…….
sab kahte hai samaj kharab hai,
samaj me kya rhte nahi aap hai,
to kyo dosh dusaro par lagaye jane chahiye;
sankalp lijiye aaj se har ghar me beti honi chahiye,
dusaro ke bharose nahi,pahal khud aap honi chahiye
pahle pita,pati or putra bankar….
pahle pita,pati or putra bankar,
prahari bante ho aap hi,
fir dusaro ki beti par nazare kyu pak nahi?
jaisi beti apni hai wo bhi to dusaro ki beti hai,
fir kyo dahej or hawas me loot jati ye beti hai?
kyo dard usaka ban saka apana nahi…
Sankalp lijiye aaj se har ghar me beti honi chahiye
dusaro ke bharose nahi,pahal khud aap honi chahiye
maa, patni or beti bankar..
maa, patni or beti bankar tujhe hi to sambhala hai,
tere liye jivan apana samarpit kar dala hai
kya tera usake liye koi farz nahi?
doodh teri maa ka tujha par karz nahi?
purushatva ka jo tu aham pale baitha hai,
na hota wo agar na hoti wo janani
hai tujhse ye ummed us maa ki,
na jaye kokha me mari koi beti;
Sankalp lijiye aaj se har ghar me beti honi chahiye
dusaro ke bharose nahi,pahal khud aap honi chahiye

                                                                                               -vidyottma choubisa

हर घर में बेटी होनी चाहिए …… इस कविता को आप हमारे यू ट्यूब चॅनेल पर जाकर भी देख सकते है।

 

 ये ज़िद ही तो हैं…….

 ये ज़िद ही तो हैं…….
ये ज़िद ही तो हैं कुछ कर गुजरने की,
जो नींद आँखों उड़ा देती है,
जागते हुए सपने दिखाती है ,पूरा करने
खुद को शिद्दत से लगा देती है;
                                                         

                                                            बुलंदियों की चाह रखने वालो,
                                                             जिद्दी तो बनाना पड़ेगा,
                                                            जो ना किया पहले कभी,
                                                            वो सब तुम्हे करना पड़ेगा;

चुनौतियां कड़ी मिलेगी पथ पर,
ना होना तुम विचलित मगर,
है माँ- बाप का हाथ सिर पर,
तो लक्ष्य के लिए हर चुनौती पार कर;

                                                            क़दम ना पीछे तू हटा,
                                                            चाहे तुफानो की आये घनघोर घटा,
                                                            तूफां ही तो तेरी परीक्षा है,
                                                            पार कर इसे जहाँ को तेरी प्रतीक्षा है;

हौसला है तो खुद को मजबूत कर,
जिद्दी है तो जिद से मजबूर कर,
पा सकता है दुनिया की चीज़,
तू है सबसे पाक,सबका अज़ीज़;
                                                           

                                                             मेहनत तेरी रंग लाएगी
                                                             चलता चल राहे आसां हो जाएगी….
                                                             ये ज़िद ही तो हैं कुछ कर गुजरने की,
                                                             जो नींद आँखों उड़ा देती है…. 

                                                                          – विद्योत्तमा चौबीसा 
Yeh zid hi to hai…..
Yeh zid hi to hai kuch kar gujarne ki,
jo nind aankho se uda deti hai,
jagte hue sapne dikhati hai, pura karne,
khud ko shiddat se laga deti hai;
bulandiyo ki chah rakhane walo,
ziddi to banana padega,
jo na kiya pahle kabhi,
wo sab tumhe karna padega;
chunoutiya kadi milegi path par,
na hona tum vichalit magar,
hai maa bap ka hath sir par,
to lakshya ke liye har chunouti par kar;
kadam na piche tu hata,
chahe tufano ki aaye ganghor ghata,
tufan hi to teri pariksha hai,
par kar ise jahan ko teri pratiksha hai;
housala hai to khud ko majboot kar,
ziddi hai to zid se majboor kar;
pa sakta hai duniya ki har chiz,
tu hai pak aur sabka aziz;
mehanat teri rang layegi,
chalta chal tu rahe aasan ho jayegi…..
yeh zid hi to hai kuch kar gujarne ki,
jo nind aankho se uda deti hai……

           – Vidyottma choubisa

आप हमारी इस कविता को यू -तुबे पर भी देख सकते है please see the link-https://youtu.be/76XtBapz8Ek

भरोसा…..

भरोसा….
ना करना इस दुनिया में किसी पर भरोसा-२
यहाँ कंधो पर बैठ कर गले काट लिया करते है;

सितमगरो की है ये दुनिया यहाँ-२
पैरो के नीचे से जमीं खींच लिया करते है;

कोई कहता है कि जान लूटा दू तुझपे-२
वक़्त आने पर वे ही लूट करते है

ना करना इस दुनिया में…..

गरीबी देखकर भाई की जो मुँह मोड़ लिया करते है-२
दौलत के वर्चस्व में गैरो से भी रिश्ता जोड़ लिया करते है,

गरीब तो फिर भी काम आते है मुसीबत में-२
पैसे वाले तो दर्द में साथ छोड़ दिया करते है,

ना करना इस दुनिया में…..

हर गली, हर तरफ चर्चे है दुश्वारी के-२
रिश्ते ना प्यार के,ना यारी के,ये तो मक्कारी के

ना तुम इन पर दिल जान लुटाओ जी-२
समय है अब भी संभल जाओ जी

वरना तुम भी कल पछताओगे
महफ़िल में भी अकेले रह जाओगे

ना करना इस दुनिया में………

                                                                                                  –विद्योत्तमा चौबीसा 

Bhaosa…..

Na karna is duniya me bharosa,
yaha kandho par baith kar gale kat liya karte hai,

sitamgharo ki hai ye duniya
yaha pero ke niche se jamin khich liya karte hai

koi kahta hai ki jaan loota doo tujhpe
waqt aane par ve hi loot liya karte hai

Na karna is duniya me….

 garibi dekhakar jo bhai ki muh mod liya karte hai
     doulat ke varchaswa me ve gero se bhi rishta jod liya karte hai

garib to fir bhi kaam aate hai musibat me
paise wale to dard me sath chod diya karte hai

Na karna is duniya me….

har gali har taraf charche hai dushwari ke
rishte na pyar ke na matlab ke ye toh hai makkari ke
na tum in par dil jaan lootao ji

waqt hai abhi bhi sambhal jao ji
varna tum bhi kal pachataoge

mahfil me akele rah jaoge
Na karna is duniya me…..
vidyottma choubisa 

 

तू अकेला है……

कोई नहीं तेरा इस जहाँ में,
तू अकेला है बस अकेला है ….
चलता चल अपनी डगर पर,
मंजिल का आनंद निराला है
जब वक़्त पर रिश्तो को आजमाया था, 
वो दूर कही तमाशबीन बने थे
अंधेरो से मै लड़ा था, 
  मेरी फटेहाली देख वो बहुत इतराये थे; 
जब चूर था मै दर्द में,
वो अपने आप में मगरूर थे;
ना  जाने ऐसा क्या हुआ था तब, 
जो वो मुझसे इतने दूर थे… 
समय बीता मैने भी माफ़ किया, 
सुना है बुरो संग बुरा नहीं हुआ करते
मानवता अपनी दिखाई की यही गलती
वो जैसे थे वैसा फिर किया करते थे
फितरत नहीं बदलती किसी की
बिच्छू को बचाओगे तो भी  वो डंक ही मारेगा
प्रकृति ने अकेला भेजा है, रिश्ते हमीं जोड़े है
सब मतलब की माया है रिश्ते केवल और केवल छाया है
कोई नहीं तेरा इस जहाँ में ,तू अकेला है बस अकेला है…..

हर घर मे बेटी होनी चाहिए…

संकल्प लिजीये आज से,हर घर मे बेटी होनी चाहिए
दुसरो के भरोसे नहीं,पहल खुद आप होनी चाहिए
सब कहते है…..
सब कहते है समाज खराब है
समाज मे क्या रहते नहीं आप हैं,
तो क्यों दोष दुसरो पर लगाए जाने चाहिए
संकल्प लिजीये आज से,हर घर मे बेटी होनी चाहिए
दुसरो के भरोसे नहीं,पहल खुद आप होनी चाहिए…..
पहले पिता,पति और पुत्र बनकर..
पहले पिता,पति और पुत्र बनकर,
प्रहरी बनते हो आप ही
फिर दुसरो की बेटी पर,नजरें क्यों पाक नहीं
जैसी बेटी अपनी है
                                                  जैसी बेटी अपनी है,वो भी तो दुसरो की बेटी है                                                      फिर क्यों दहेज़ और हवस से लूट जाती ये बेटी है
क्यों दर्द उसका बन सका अपना नहीं
संकल्प लिजीये आज से
हर घर मे बेटी होनी चाहिए
माँ, पत्नी और बेटी बनकर तुझे ही तो संभाला है
तेरे लिए जीवन समर्पित कर डाला है
क्या तेरा उसके लिए कोई फ़र्ज़ नहीं
दूध तेरी माँ का तुझ पर क़र्ज़ नहीं
है तुझ से यही उम्मीद तुझसे उस माँ की
ना जाये कोख में मारी कोई बेटी
पुरुषत्व का अहम् बैठा है ना होता वो
अगर ना होती वो जननी…..
                                          संकल्प लिजीये आज से,हर घर मे बेटी होनी चाहिए                                          दुसरो के भरोसे नहीं,पहल खुद आप होनी चाहिए

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जिंदगी का सफर

 
ज़िन्दगी से होकर मायूस सा
चलने लगा इस क़दर
न रास्ते थे पहचाने
और न मंज़िल की ख़बर
तन्हाई थी साथी मेरी
और खामोश थी नज़र
पग-पग पर मिले अजनबी,
कोई राही बना कोई हमसफ़र,
किसी ने तड़पता छोड़ दिया,
और कोई रहा हमसे बेखबर 
ना रिश्ते अपने सच्चे थे,
ना दोस्त इतने अच्छे थे,
कदम-कदम पर खाकर ठोकर
रिश्तो को में जान पाया ,
ना अपना हैं कोई यहाँ न कोई पराया,
ये तो है पैसो की माया,
ज़िन्दगी से होकर मायूस सा
चलने लगा इस क़दर
ना रास्ते थे पहचाने
और न मंज़िल की ख़बर

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